SPORTS DESK : जापान के नागोया में आयोजित एशियन गेम्स 2026 में भारत ने कुल 85 पदकों के साथ अपने अभियान का अंत किया। भारतीय दल ने 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य पदक जीते और पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा। हालांकि, भारत 100 पदकों के तय लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका और 2023 के हांगझोउ एशियन गेम्स के अपने रिकॉर्ड प्रदर्शन से भी 21 पदक पीछे रह गया।
इस प्रदर्शन को लेकर सबसे बड़ा सवाल टैलेंट की पहचान और खिलाड़ियों पर होने वाले निवेश को लेकर सामने आया है। भारतीय खेल मंत्रालय की Target Olympic Podium Scheme यानी TOPS के तहत हांगझोउ और नागोया एशियन गेम्स के बीच करीब 97.84 करोड़ रुपये खर्च किए गए। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, इस निवेश का लगभग 2 फीसदी ही इस बार स्वर्ण पदकों में तब्दील हुआ।
रिपोर्ट में कुछ ऐसे खिलाड़ियों का भी जिक्र है, जिन्होंने TOPS का हिस्सा न होने के बावजूद भारत के लिए बड़ा प्रदर्शन किया। 17 वर्षीय तीरंदाज कुमकुम मोहोड ने भारत के लिए महिला रिकर्व में ऐतिहासिक व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीता। वहीं निशानेबाज सुरुचि सिंह को TOPS में हाल ही में शामिल किया गया था और उन्होंने कमलजीत सिंह के साथ मिलकर मिक्स्ड टीम में स्वर्ण पदक जीता। नीरू धांडा ने भी ट्रैप में स्वर्ण पदक जीता, लेकिन वह TOPS की कोर ग्रुप सूची में शामिल नहीं थीं।
भारत के 21 स्वर्ण पदकों में से 13 स्वर्ण टीम इवेंट्स से आए। इनमें कुछ ऐसे खेल भी शामिल हैं जो ओलंपिक का हिस्सा नहीं हैं। दूसरी ओर, भारत ने 27 में से 19 रजत पदक व्यक्तिगत स्पर्धाओं में जीते। यह आंकड़ा भारतीय खेलों की एक अहम तस्वीर सामने रखता है—टीम इवेंट्स में भारत की गहराई बढ़ रही है, लेकिन व्यक्तिगत स्पर्धाओं में खिलाड़ी रजत से स्वर्ण तक पहुंचने की अंतिम चुनौती से जूझ रहे हैं।
भारत के प्रदर्शन में कुछ बड़ी उपलब्धियां भी रहीं। कुमकुम मोहोड ने तीरंदाजी में ऐतिहासिक सफलता हासिल की, जबकि सुरुचि सिंह और कमलजीत सिंह की जोड़ी ने शूटिंग में स्वर्ण जीता। नीरू धांडा ने भी ट्रैप स्पर्धा में भारत को ऐतिहासिक स्वर्ण दिलाया। इन प्रदर्शन से यह संकेत मिलता है कि देश में नई प्रतिभाएं उभर रही हैं, लेकिन उन्हें सही समय पर पहचानकर पर्याप्त समर्थन देने की जरूरत है।
अब भारतीय खेलों का ध्यान लॉस एंजिल्स 2028 ओलंपिक पर है। एशियन गेम्स का यह प्रदर्शन भारत के लिए एक तरफ नई प्रतिभाओं और टीम स्पर्धाओं में बढ़ती मजबूती की उम्मीद जगाता है, तो दूसरी तरफ व्यक्तिगत स्पर्धाओं में स्वर्ण पदकों की कमी और प्रतिभा पहचान की व्यवस्था पर पुनर्विचार की जरूरत भी दिखाता है।









