सुप्रीम कोर्ट ने 60 साल पुराना विवाद सुलझाया
PUNJAB DESK : पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के बीच बिजली के बंटवारे को लेकर दशकों से चल रहा विवाद आखिरकार समाप्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए पंजाब और हरियाणा को अगले 20 वर्षों में हिमाचल प्रदेश को कुल 11,973 मिलियन यूनिट (MU) बिजली उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। यह विवाद भाखड़ा-नांगल और ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं से मिलने वाली बिजली में हिमाचल के हिस्से को लेकर था।
हर साल 598 मिलियन यूनिट बिजली देने का निर्देश
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने तय किया कि पंजाब और हरियाणा मिलकर हर साल लगभग 598 मिलियन यूनिट बिजली हिमाचल प्रदेश को देंगे। यह आपूर्ति अक्टूबर से मार्च के बीच यानी कम बिजली उपलब्धता वाले सीजन में की जाएगी। अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से रखे गए प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए बिजली के रूप में बकाया चुकाने की व्यवस्था तय की है। इस तरह राज्यों को नकद भुगतान करने के बजाय बिजली की आपूर्ति के माध्यम से अपना बकाया पूरा करना होगा।
हिमाचल का 7.19 प्रतिशत हिस्सा था विवाद की जड़
इस पूरे विवाद की शुरुआत वर्ष 1966 से जुड़ी है। पंजाब के पुनर्गठन के बाद भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली में हिमाचल प्रदेश ने अपना निर्धारित हिस्सा मांगा था। साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश को इन परियोजनाओं से संबंधित बिजली में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी का अधिकार दिया था। हालांकि, इस फैसले को लागू करने के दौरान बकाया बिजली की मात्रा, उसकी कीमत और बांधों के निर्माण पर हुए खर्च को लेकर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के बीच मतभेद बने रहे।
420 करोड़ रुपये की लागत का भी होगा समायोजन
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने हिमाचल प्रदेश के कुल बिजली बकाये का आकलन 13,066 मिलियन यूनिट किया था। बाद में बांधों के निर्माण और उनसे जुड़े पुराने पूंजीगत खर्चों को समायोजित करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 11,973 मिलियन यूनिट बिजली देने का अंतिम निर्देश दिया।अदालत ने हिमाचल प्रदेश की परियोजनाओं की पूंजीगत लागत में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी को 420.77 करोड़ रुपये माना है। इसे 3.85 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली के बकाये में समायोजित किया जाएगा।
10, 15 और 30 साल की समयसीमा पर था मतभेद
बिजली का बकाया कितने समय में पूरा किया जाए, इसे लेकर तीनों पक्षों के अलग-अलग प्रस्ताव थे।
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हिमाचल प्रदेश चाहता था कि उसे बकाया बिजली 10 वर्षों में मिले।
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केंद्र सरकार ने 15 साल में आपूर्ति का सुझाव दिया था।
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पंजाब ने भुगतान के लिए 30 साल की अवधि मांगी थी।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 20 साल की अवधि तय की। अदालत का उद्देश्य हिमाचल प्रदेश को उसका अधिकार दिलाने के साथ पंजाब और हरियाणा पर एकमुश्त आर्थिक बोझ पड़ने से बचाना भी था।
1996 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था मामला
हिमाचल प्रदेश ने अपने बिजली हिस्से का दावा करते हुए वर्ष 1996 में संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। वर्ष 2011 में अदालत ने हिमाचल के पक्ष में फैसला दिया, लेकिन उसके क्रियान्वयन को लेकर विवाद जारी रहा। अब सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देशों के बाद दशकों से लंबित इस मामले का निपटारा हो गया है। इससे भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाओं से जुड़े बिजली बंटवारे की व्यवस्था को लागू करने का रास्ता साफ हो गया है।









